ब्रह्म मुहूर्त काल प्रारंभ हो चुका था । मठ में धीरे- धीरे चहल-पहल तेज हो चली थी । शंकर अपने शिष्यों और अनुयाईयों के साथ गंगा स्नान
के लिए तीव्र कदमों से बढ़ रहे थे । तप के तेज से दैदीप्यमान मुख, मुण्डित उन्नत
ललाट, गौर वर्ण, भाल पर त्रिपुण्ड तिलक और आंतरिक ज्ञान की ज्योति से उज्जवल इस
युवा सन्यासी की चर्चा पूरे देश में हो रही थी । यह ईसा पश्चात 8वीं शताब्दी का
काल था, जब वैदिक धर्म अनेक प्रकार की विकृतियों से घिरा हुआ था । निरीह झुण्ड के
झुण्ड पशुओं की बलि, जादु-टोना, विकृत तांत्रिक प्रक्रियाओं से देवताओं को प्रसन्न करके उनसे स्वयं की उन्नति की आकांक्षा बढ़ती
जा रही थी । पुरोहित वर्ग द्वारा वेद, उपनिषद् इत्यादि की मनमाने ढंग से अपने स्वार्थ
के लिए व्याख्या की जा रही थी । ऐसे वातावरण में शंकर ने वैदिक धर्म को
पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया हुआ था । शंकर ने उस काल के वेद,
उपनिषदों के बड़े बड़े ज्ञाता आचार्यों और पुरोहितों से निरंतर शास्त्रार्थ कर उन्हें
पराजित करते हुए वैदिक धर्म के मूल स्वरूप को स्थापित करने का महती कार्य
प्रारंभ कर दिया था । अभी हाल ही में उन्होंने काशी के एक सुविख्यात आचार्य को
शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया था । उस समय के नियमानुसार उक्त आचार्य अपने
समस्त शिष्यों के साथ शंकर के अनुयायी बन गए थे । रास्ते में दर्शनों के लिए
भारी जनसमूह रास्तों पर एकत्र था जो हाथ में धर्म के प्रतीक दंड को धारण किए इस
युवा सन्यासी की एक झलक पाने के लिए उत्सुक खड़ा था । तभी शंकर के कानों
में श्वान के बच्चे की दारूण चीत्कार सुनाई दी । ऐसा प्रतीत होता था कि यह श्वान
शिशु अपनी माता से बिछुड़ गया था, जिसे कदाचित किसी जानवर ने हमला कर घायल कर दिया
था । शंकर ने करूण दृष्टि से इस श्वान शिशु को देखकर अपने एक शिष्य को उसकी
चिकित्सा एवं परिचर्या के लिए निर्देशित किया । तत्पश्चात पुन: तीव्र गति से
गंगा नदी की ओर बढ़ चले । गंगा नदी की ओर से मंद मंद शीतल समीर तन में सिहरन पैदा कर
रही थी । पक्षियों का मंद कलरव हवा की हल्की सरसराहट के साथ प्राकृतिक संगीतमय
वातावरण की सृष्टि कर रहा था । आत्ममग्न एवं प्रफुल्लित शंकर के मुख से स्वत: बोल
फूट पड़े ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या । यह समस्त जगत माया है, केवल ब्रह्म सत्य
है । सृष्टि की प्रत्येक वस्तु उसी ब्रह्म से उत्पन्न हुई है और उसी ब्रह्म में
समा रही है ।
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