गुरुवार, 10 नवंबर 2016

जगद्गुरु का आर्विभाव

ब्रह्म मुहूर्त काल प्रारंभ हो चुका था । मठ में धीरे- धीरे चहल-पहल तेज हो चली थी । शंकर अपने शिष्‍यों और अनुयाईयों के साथ गंगा स्नान के लिए तीव्र कदमों से बढ़ रहे थे । तप के तेज से दैदीप्‍यमान मुख, मुण्डित उन्‍नत ललाट, गौर वर्ण, भाल पर त्रिपुण्‍ड तिलक और आंतरिक ज्ञान की ज्‍योति से उज्‍जवल इस युवा सन्‍यासी की चर्चा पूरे देश में हो रही थी । यह ईसा पश्‍चात 8वीं शताब्‍दी का काल था, जब वैदिक धर्म अनेक प्रकार की विकृतियों से घिरा हुआ था । निरीह झुण्‍ड के झुण्‍ड पशुओं की बलि, जादु-टोना, विकृत तांत्रिक प्रक्रियाओं से देवताओं को प्रसन्‍न  करके उनसे स्‍वयं की उन्‍नति की आकांक्षा बढ़ती जा रही थी । पुरोहित वर्ग द्वारा वेद, उपनिषद् इत्‍यादि की मनमाने ढंग से अपने स्‍वार्थ के लिए व्‍याख्‍या की जा रही थी । ऐसे वातावरण में शंकर ने वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया हुआ था । शंकर ने उस काल के वेद, उपनिषदों के बड़े बड़े ज्ञाता आचार्यों और पुरोहितों से निरंतर शास्‍त्रार्थ कर उन्‍हें पराजित करते हुए वैदिक धर्म के मूल स्‍वरूप को स्‍थापित करने का महती कार्य प्रारंभ कर दिया था । अभी हाल ही में उन्‍होंने काशी के एक सुविख्‍यात आचार्य को शास्‍त्रार्थ में पराजित कर दिया था । उस समय के नियमानुसार उक्‍त आचार्य अपने समस्‍त शिष्‍यों के साथ शंकर के अनुयायी बन गए थे । रास्‍ते में दर्शनों के लिए भारी जनसमूह रास्‍तों पर एकत्र था जो हाथ में धर्म के प्रतीक दंड को धारण किए इस युवा सन्‍यासी की एक झलक पाने के लिए उत्‍सुक खड़ा था । तभी शंकर के कानों में श्‍वान के बच्‍चे की दारूण चीत्‍कार सुनाई दी । ऐसा प्रतीत होता था कि यह श्‍वान शिशु अपनी माता से बिछुड़ गया था, जिसे कदाचित किसी जानवर ने हमला कर घायल कर दिया था । शंकर ने करूण दृष्टि से इस श्‍वान शिशु को देखकर अपने एक शिष्‍य को उसकी चिकित्‍सा एवं परिचर्या के लिए निर्देशित किया । तत्‍पश्‍चात पुन: तीव्र गति से गंगा नदी की ओर बढ़ चले । गंगा नदी की ओर से मंद मंद शीतल समीर तन में सिहरन पैदा कर रही थी । पक्षियों का मंद कलरव हवा की हल्की सरसराहट के साथ प्राकृतिक संगीतमय वातावरण की सृष्टि कर रहा था । आत्‍ममग्‍न एवं प्रफुल्लित शंकर के मुख से स्‍वत: बोल फूट पड़े ब्रह्म सत्‍यं जगत मिथ्‍या । यह समस्‍त जगत माया है, केवल ब्रह्म सत्‍य है । सृष्टि की प्रत्‍येक वस्‍तु उसी ब्रह्म से उत्पन्‍न हुई है और उसी ब्रह्म में समा रही है ।

 अकस्‍मात् उन्‍होंने देखा कि उसी रास्‍ते पर सामने से एक चाण्‍डाल श्‍वानों के झुण्ड के साथ तेज गति से उनकी ओर चला आ रहा था । पुष्‍ट श्‍यामल शरीर, जटाजूट धारी और म्‍लान वस्‍त्रों धारण किये इस चांडाल को अपनी ओर बढ़ते देख शंकर त्‍योरियॉं चढ़ा कर तीव्र स्‍वर में चिल्‍लाए- रे चांडाल, परे हट । अपने स्‍पर्श से मुझे अपवित्र करना चाहता है । चांडाल किंचित धृष्‍टता दिखाते हुए अपने स्‍थान पर अड़ा रहा । शंकर ने पुन: क्रोध के साथ उससे स्‍थान छोड़ने के लिए कहा । चांडाल ने विनय भाव से दोनों हाथ जोड़कर दृढ़ शब्‍दों में कहा- पूज्‍य आचार्य, मैं एक शूद्र हूँ और आप बहुत बड़े मनीषी और विज्ञ पुरूष हैं । किंतु जब तक आप मेरे कुछ प्रश्‍नों का उत्‍तर नहीं देंगे, तब तक मैं मार्ग नहीं छोडूंगा । कुछ क्षण रुकने के पश्चात उसने पूछा - जैसा कि आप कहते हैं कि इस जगत में सब कुछ मिथ्‍या है, माया है । इसके अनुसार यदि मेरा और आपका शरीर माया है, तो मेरे स्‍पर्श से आप कैसे अपवित्र हो जाएंगे और इस मायारूपी जगत में समान तनधारी मनुष्‍यों के बीच छुआछूत क्‍या अनुचित नहीं है । बड़े बड़े आचार्यों को शास्‍त्रार्थ में पराजित करने वाले वेद और उपनिषदों के ज्ञाता महाज्ञानी शंकर के पास इसका कोई उत्‍तर नहीं था । चांडाल बोला – यदि आप मुझे अछूत और अशुद्ध मानते है तो क्‍या आप बताएंगे यह अशुद्धि कहॉं है ? क्‍या यह अशुद्धि मेरे शरीर में है या मेरी आत्‍मा में ? क्‍योंकि यदि शरीर माया है तो यह अशुद्धि आत्‍मा में होनी चाहिए । जबकि आपकी शिक्षाओं के अनुसार आत्‍मा सदैव शुद्ध है और परमचेतना ही सर्वव्‍यापी है । मेरा दूसरा प्रश्‍न है कि एक ही सूर्य से निकली किरणों का प्रकाश गंगा के जल और कीचड़ के जल से समान रूप से परावर्तित होता है । इससे क्या सूर्य के अपवित्र होने की आशंका रहती है ? चांडाल के इन प्रश्‍नों ने शंकर को महान आश्‍चर्य से भर दिया । वह जान चुके थे कि इस चांडाल ने उन्‍हें अद्वैतवाद का सही पाठ पढ़ाया है । जिस ज्ञान की शिक्षा वह संपूर्ण मानवजाति को प्रदान कर रहे थे उसके वास्तविक मर्म से इस चांडाल ने उन्‍हें परिचित करा दिया था । चेतना के ऊपर जो झीना पर्दा पड़ा हुआ था, सहसा हट गया और अब सब कुछ साफ साफ दिखाई दे रहा था । अब एक ब्राहमण और एक चांडाल का भेद समाप्‍त हो गया था । क्षुद्र विचार ज्ञान के महासागर में विलीन हो रहे थे । घृणा की छाया को प्रेम के आलोक ने अपने में समा लिया था । वहॉं उपस्थित शंकर के शिष्‍य और जनसमूह गहन आश्‍चर्य और जिज्ञासा से इस दृष्‍य हो देख रहे थे । चांडाल के समक्ष दंडवत शंकर के गुरू गंभीर शब्‍द वातावरण में गूँज रहे थे : जिसने मुझे परम सत्‍य का साक्षात्‍कार कराया, जिसने सही रूप में शुद्ध चेतन अवस्‍था को जाना है और जिसने मुझे यह बोध कराया है कि उपनिषद की शिक्षाओं का सामाजिक, नैतिक रूप से कोई विभेद नहीं है, वह चांडाल ही मेरा गुरू है । पूर्व से सूर्य  सारे वातावरण में अपनी रश्मियॉं बिखेर रहा था जिससे अंधकार की कालिमा और धुंध शनै:शनै: छटती जा रही थी । एक युवा सन्‍यासी अब सही मायने में जगतगुरू आदि शंकराचार्य में परिवर्तित हो गया था ।     
****                                                                 *****  

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

ओरछा पार्ट-3


चतुभुज मंदिर, ओरछा

चतुर्भुज मंदिर: अद्भुत शिल्‍प, विशालकाय भवन, सुंदरतम कारीगरी और उच्‍चकोटि की कलात्‍मकता के बावजूद अपने आराध्‍य के बगैर किसी मंदिर को आप देखना चाहें तो चतुर्भुज मंदिर में आपका स्‍वागत है । इस मंदिर का इतिहास ही ऐसा है कि इस मंदिर से सटा हुआ एक समय का रनिवास आज का प्रसिद्ध रामराजा का मंदिर है, जबकि चतुर्भुज मंदिर सैकड़ों वर्षों से बगैर देव प्रतिमा के अभिशप्‍त सा खड़ा हुआ है । दरअसल सन् 1558 से 1575 के मध्‍य राजा मधुकर शाह जी ने इस मंदिर का निर्माण अपनी रानी द्वारा अयोध्‍या से लाए जा रहे भगवान श्रीराम जी के लिए निर्मित करवाया था, लेकिन रानी गणेशकुँवरी ने श्रीराम की प्रतिमा को कुछ समय के लिए अपने रनिवास में स्‍थापित कर दिया । एक बार स्‍थापित होने के बाद फिर रानी के राजमहल को ही मंदिर का रूप प्रदान कर दिया गया और चतुर्भुज मंदिर सुंदर होनेे के बावजूद सूना पड़ा रहा । एक विशालकाय चट्टान के ऊपर बना यह मंदिर अपनी विशालता और कलात्‍मक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है । इसकी भीतरी छत की ऊँचाई इसे अपने समय के अन्‍य मंदिरों से अलग विशेषता प्रदान करती है ।



लक्ष्‍मीनारायण मंदिर का विहंगम दृश्‍य
लक्ष्‍मीनारायण मंदिर: यह मंदिर अपनी विशिष्‍ट वास्‍तुकला और छत पर उकेरेे गए चित्रों के लिए हमेशा पर्यटकोंं को अपनी ओर आकर्षित करता है । इसका निर्माण कार्य 1622 में महाराज वीर सिंह जू देव द्वारा प्रारंभ कराया गया । उसके बाद से अलग अलग चरणों में इसका विस्‍तार, सुधार और रेनोवेशन किया जाता रहा । यह एक उँचे टीले पर बना हुअाा त्रिभुजाकार आकृति का मंदिर  है , जिसका केन्‍द्रीय मंदिर अष्‍टभुजाकार आकृति का है । मंदिर के अंदर दीवारों और छत पर बहुत सुंदर चित्रकारी उकेरी गई है जिनमें प्राचीन पौराणिक कथाओं, युद्ध के दृश्‍य, सांस्‍कृतिक आयोजनों के साथ साथ 1857 के स्‍वातंत्र्य् विद्रोह की छ‍वियॉं बड़ी ही सुंदरता से बनाई गई हैं । इसकी छत पर बनी पेंटिंग्‍स निहायत खूबसूरत हैं और इनको सुकून से फर्श पर लेटकर घंटों निहारा जा सकता है । हर एक चित्र अपनी कहानी बयां करता है ।  

लक्ष्‍मी नारयण मंदिर, ओरछा



छतरियॉं
छतरियॉं: ओरछा के दिवंगत राजाओं की स्‍मृति में बनी छतरियॉं बेतवा नदी के किनारे किनारे बनाई गई हैं । शाम के धुंधलके में बेतवा नदी के किनारे बैठकर इन छतरियों को देखनेे एक अलग ही अनुभव है और जीवन की निस्‍सारता  का अहसास  कराता  है । राजा वीर सिंह को छोड़कर सभी छ‍तरियॉं मंदिर शैली में निर्मित हैं, जबकि राजा वीर सिंह की छतरी इण्‍डो-इस्‍लामिक शैली में बनाई  गई  है ।  
ओरछा बाबा की पोटली की तरह है, जो है तो छोटी सी लेकिन एक से एक पर्यटक रत्‍न भरे पड़े हैं । ओरछा गागर में सागर की तरह है आप गहरे उतरते जाइए, इतिहास की परत दर परत खुलती जाएगी ।  जगह छोटी सी लेकिन मन मोहिनी ।  छोटा करते करते भी तीन पार्ट बन गए और अभी लगता है कि बहुत कुछ छूट गया है ।  राय प्रवीण महल, राज महल, बेतवा नदी, ओरछा अभयारण्‍य आदि-आदि । हर स्‍थान अपने में पूरी एक कहानी समेटे हुए है । रामराज मंदिर में जरा बाहरी ऑंखें बंद कर अंदर के नयन खोलिए, महारानी गणेश कुँवरी श्री राम की भक्ति में भाव विह्वल, तन-मन की सुध खोए बैठी हैं । जहॉंगीर महल में महाराजा वीर सिंह जू देव के दरबार में फारस से आया वास्‍तुविद नयी इमारत बनाने का मशविरा दे रहा है । राय प्रवीण महल में राय प्रवीण कवि केशव के सान्निध्‍य में नई कविता की रचना कर रही है । और इन सबके बीच आप बेतवा नदी के किनारे मनोरम वातावरण में बैठे प्राकृतिक दृश्‍यों को निहार रहे हैं ।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

ओरछा - पार्ट-2 जहॉंगीर महल

जहाॅंगीर महल - मुगल सम्राट जहाँगीर और ओरछा के शूरवीर राजा वीर सिंह की सच्‍ची मित्रता का जीता जागता सबूत । जहॉंगीर महल के निर्माण की कहानी रोचक है, जिसके लिए मैं आपको मुगल काल के अतीत के उन पृष्‍ठों की ओर ले चलूँगा, जहॉं मुगल इतिहास का सबसे महान सम्राट अकबर अपने ही पुत्र सलीम या जहाँगीर के सामने बेबस हो गया था । जहाँगीर भी अपने पिता की छाया से दूर अपना  मुकाम  बनाना चाहता  था । वहॉं दक्षिण में अकबर विद्रोह को दबाने के लिए प्रयासरत था और यहॉं आगरा में जहॉंगीर ने अपने को स्‍वतंत्र शासक घोषित कर दिया । बेटे की महत्‍वाकांक्षाएं पिता को रास न आईं और अकबर ने अपने ही लाड़ले बेटे जहाँगीर को विद्रोही घोषित कर दिया । आखिरकार पूरे हिंदुस्‍तान पर एकछत्र राज्‍य करने वालेे जिल्‍लेइलाही ने शहजादे सलीम को सबक सिखाने के लिए भारी लाव लश्‍कर भेजा । इस लश्‍कर के साथ अबुल फजल भी थे, जो कि उम्‍दा लेखक और अकबर के नवरत्‍नों में से एक थे । लेकिन शायद अकबर को भी यह मालूम न था कि ओरछा के रणबॉंकुरे शासक वीर सिंह पहले ही जहाँगीर को अपना दोस्‍त बना चुके थे । ओरछा का शासक बनने से पहले वीर सिंह झॉसी और ग्‍वा‍लियर के बीच पड़ने वाले बदोनी के जागीरदार थे । दोस्‍ती का फर्ज निभाने के लिए राजा वीर सिंह ने जहाँगीर के पास पहुँचने से पहले ही मुगल सेना से लोहा लिया । इस युद्ध में वीर सिंह ने न सिर्फ मुगल सेना को करारी शिकस्‍त दी, वरन् अबुल फजल का सिर काटकर इसेे अपनी दोस्‍ती के ताेहफे के तौर पर होने वाले मुगल शासक जहाँगीर को थाल में सजाकर भेंट कर दिया । यह सन् 1602 की घटना है । यह मान लें कि इस जीत ने ही ओरछा के शासक वीर सिंह और जहाँगीर की दोस्‍ती की बुनियाद को हमेशा के लिए पक्‍का कर दिया और इस बुनियाद पर ही जहाँगीर महल का वजूद खड़ा हुआ । जहाँगीर ने मुगलिया तख्‍त पर बैठते ही वीर सिंह जू देव को बुंदेलखण्‍ड का शासक और ओरछा को बुंदेलखंड की राजधानी घोषित कर दिया । इतना ही नहीं इस कला प्रेमी शहंशाह ने राजा वीर सिंह केे राजतिलक मेंं आने की स्‍वीकृति भी दे दी । जहाँगीर के मुगल  सम्राट बनने के पश्‍चात प्रथम ओरछा आगमन पर अपनी दोस्‍ती की स्‍मृति को चिरस्‍थाई बनाने के लिए ओरछा नरेश राजा वीर सिंह जू देव ने जहॉंगीर महल का निर्माण करवाया ।


आसमान की ओट में जहॉंगीर महल का सुुंदर दृश्‍य

जहॉंगीर महल के आंगन का दृश्‍य
17वीं शताब्‍दी में निर्मित यह यह तीन मंजिला इमारत इण्‍डो-मुगल शैली में स्‍थापत्‍य कला का अनुपम उदाहरण है । इसका मुख्‍य दरवाजा कलात्‍मक और परंपरागत तरीके से बनाया गया है । राजा के आगमन की जानकारी यहॉं स्‍थापित पत्‍थर के हाथियों के गले में पड़ी घंटियों द्वारा दी जाती थी । इस इमारत के विशालकाय गुंबद परसियन शैली में बने है । नीचे मखमली हरी घास के उद्यान इतने बड़े़े हैं कि इनमें हाथी भी आसानी से प्रवेश कर सकते थे । महल के बीचों बीच विशालकाय आँगन है जहॉं नृत्‍य, नाटक इत्‍यादि राग रंग के कार्यक्रम आयोजन किए जाते थे । इस इमारत की एक और विशेषता इसकी हैंगिंग बाल्‍कनियॉं हैं । जहाँगीर महल की विशालता का अनुमान लगाने के लिए यह जान लें कि इसमें 100 से ज्‍यादा कमरे और अनगिनत झरोखे हैं । इन झरोखेां में कुछ देर शांति से बैठकर शीतल वायु का आनंद लें और ओरछा का विहंगम दृश्‍य देखें । भारतीय पुरातत्‍व विभाग द्वारा यहॉं लेजर शो का भी आयोजन किया जाता है । इस विशालकाय महल केे उद्यान, दीवारों पर उकेरी गई रंगीन चित्रकारी, खुले झरोखे, दीर्घ गुबदें और छतरियॉं आपको दूसरी ही दुनिया में ले जायेंगी और आपको पुन: यहॉं आने के लिए मजबूर करेंगी ।  


जहॉंगीर महल की दीवारों पर बनी खूबसूरत पेंटिंग्‍स


ओरछा में पुराता‍त्विक महत्‍व के अन्‍य अनेक एतिहासिक और दर्शनीय स्‍थलों की जानकारी के लिए शीघ्र ही ओरछा पार्ट-3 प्रकाशित करने की तैयारी में हूँ ।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

ओरछा - पार्ट - 1

ओरछा: बुंदेलखंड के भाल पर जगमगाता हीरक तिलक । बुंदेलखंड के लोगों की जिजीवषा, बहादुरी के साथ कलाप्रेम की बानगी दिखाती जगह है ओरछा । बेतवा के तट पर स्थित प्राकृतिक सम्पदा और सुंंदरता से भरपूर स्‍थान । आप ओरछा पहुँचते ही सम्मोहन की अवस्था में आ जाते हैं । मुश्किल से  3-4 वर्ग किलोमीटर में फैली इस जगह का प्रत्‍येक दर्शनीय स्‍थान आपकी स्‍मृति में अंकित हो जाएगा । तो सबसे पहले यहाँ कैसे पहुंचा जाये, इसकी चर्चा कर लें । झांसी से ओरछा मात्र 16 किलोमीटर  की दुरी पर पड़ता है और झाँसी जो की उत्तर प्रदेश का प्रमुख शहर है, रेल तथा  सड़क मार्ग द्वारा पुरे भारत से बड़ी अच्छी तरह जुड़ा हुआ है । विशेषकर रेल मार्ग से तो भारत के किसी भी हिस्से से झाँसी बड़ी आसानी और तेजी से पहुंचा जा सकता है । झाँसी भी ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ महारानी लक्ष्मी बाई के किले सहित कई दर्शनीय स्थल है, जिनकी चर्चा फिर किसी पोस्ट में । झांसी में अगर थोडा  टाइम आपके पास है और उसका उपयोग करना चाहते हैंं तो फिर झॉंसी का किला देख आइये, आपको अच्छा लगेगा. झाँसी से ओरछा जाने के लिए ढेर साधन मौजूद हैं, बस, प्राइवेट टैक्सी, मिनी  पब्लिक ट्रांसपोर्ट से लेकर ऑटो रिक्शा तक । इस रूट पर ट्रेन उपलब्ध नहीं है । झाँसी से निकलकर ओरछा जाने वाली सड़क तक पहुँचते ही चारों ओर फैली हरियाली आपकी यात्रा की थकान को दूर करना शुरू कर देगी ।

ओरछा में ठहरने के लिए आपके बजट के अनुसार ढेर सारे छाेटे बड़े होटल, गेस्‍ट हाउस इत्‍यादि उपलब्‍ध हैं । मध्‍य प्रदेश सरकार द्वारा संचालित 'बेतवा रिट्रीट' के अलावा होटल शीश महल, होटल बुदेलखंड रिवरसाईड, ओरछा रिसोर्ट इत्‍यादि कुछ प्रमुख आरामदायक होटल्‍स हैं ।

ओरछा की सबसे प्रमुख जगह, जिसके कारण यहाँ का धार्मिक महत्व अयोध्या के समान है, वह है रामराजा मंदिर.  और ओरछा के लोग तो हल्‍की सी मुस्‍कराहट के साथ इतराते हुए आपको यही कहेंगे की जबसे श्रीराम राजा सरकार अयोध्या से  ओरछा पधारे हैं तबसे अयोध्या में  बचा ही क्या है । श्रीरामजी के अयोध्या से ओरछा आने की कहानी आप ओरछावासियो से ही सुने तो आपको ज्‍यादा आनंद आएगा । रामराजा सरकार का विशाल मंदिर पुराने बस स्टैंड के सामने से ही दिखता है । विस्‍तृत बाहरी प्रांगण में प्रवेश करतेे ही भक्‍तों का हुजूम आपके सामने होगा । मंदिर के अंदर प्रवेश करने सेे पहले ध्‍यान रखें कि कोई चमड़े की वस्‍तु जैसे बेल्‍ट इत्‍यादि बाहर ही उतार दें । मंदिर के अंदर मुख्‍य गर्भगृह में राम दरबार की झॉंकी विराजमान है तथा चारों ओर अन्‍य देवी देवताओंं की चौकियॉं स्थित हैं । श्रीराम राजा सरकार की एक झलक पाने के लिए व्‍याकुल भक्‍तजन मुख्‍य गर्भगृह के बाहर प्‍यासी नजरों के साथ करबद्ध खड़े आपको दिख जाएंगे । भक्‍तों के हृदय से सहज ही स्‍वर लहरी फूट पड़ती है : 'श्री रामचंद्र कृपालु भज मन, हरहु भव भय दारूणम्' । आपकी धर्म में रूचि हो या न हो लेकिन ऐसे प‍वित्र स्‍थान पर जाकर स्‍वत: ही अंतरतम में प्रशांति छाने लगती है । यहॉं पर किसी प्रकार की जल्‍दबाजी न करते हुए गहराई और सूक्ष्‍मता से निहारने पर आपको भक्ति, समर्पण, आध्‍यात्‍म और प्रेम के कई रंग दिखने लगते हैं । जैसा कि नाम से जाहिर है रामराजा सरकार मंदिर में श्रीरामजी की पूजा एक राजा केे तौर पर की जाती है तथा एक राजा की ही तरह उन्‍हें सुबह-शाम गारद द्वारा सशस्‍त्र सलामी दी जाती है । 




रामराजा सरकार मंदिर
मंदिर के बाहर निकलते ही बायीं ओर नजरें घुमाने पर आपको दो ऊँचे खंबे दिखाई देंगे । ये खंबे ओरछा के महाराजाओं द्वारा गर्मी के दिनों में सर्दी के अहसास के लिए बनवाए गए कूलिंग सिस्‍टम का एक अंग है । पर्सियन शैली में बनाया गया यह कूलिंग सिस्‍टम शायद भारत में केवल ओरछा में ही है, ऐसा जानकारों का मानना है । इन खंबों का नाम भारतीय कैलेण्‍डर में बारिश के मौसम केे महीनों के नाम पर 'सावन-भादों'  रखा गया है । ओरछा जाने पर इस सिस्‍टम को भी जरूर देखकर आयें ।  यहीं पर एक विशाल उद्यान है, जहॉं लालाा हरदौल की समाधि स्थित है । बुंदेलखंड में आज भी विवाह के समय पहला आमंत्रण लालाा हरदौल को दिया जाता है । लाला हरदौल की पीढि़यों से चली आ रही जनश्रुति, जिसमें रिश्‍तों के विश्‍वास के लिए बलिदान की महिमा है, फिर कभी आपके सामने लेकर आएंगे ।


सावन-भादों खंबे

अभी ओरछा में जानने-सुनने-देखने के लिए बहुत कुछ बाकि बचा है, जिसके लिए जल्‍दी ही ओरछा-2 प्रकाशित करने की कोशिश करूँगा ।