शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

ओरछा - पार्ट-2 जहॉंगीर महल

जहाॅंगीर महल - मुगल सम्राट जहाँगीर और ओरछा के शूरवीर राजा वीर सिंह की सच्‍ची मित्रता का जीता जागता सबूत । जहॉंगीर महल के निर्माण की कहानी रोचक है, जिसके लिए मैं आपको मुगल काल के अतीत के उन पृष्‍ठों की ओर ले चलूँगा, जहॉं मुगल इतिहास का सबसे महान सम्राट अकबर अपने ही पुत्र सलीम या जहाँगीर के सामने बेबस हो गया था । जहाँगीर भी अपने पिता की छाया से दूर अपना  मुकाम  बनाना चाहता  था । वहॉं दक्षिण में अकबर विद्रोह को दबाने के लिए प्रयासरत था और यहॉं आगरा में जहॉंगीर ने अपने को स्‍वतंत्र शासक घोषित कर दिया । बेटे की महत्‍वाकांक्षाएं पिता को रास न आईं और अकबर ने अपने ही लाड़ले बेटे जहाँगीर को विद्रोही घोषित कर दिया । आखिरकार पूरे हिंदुस्‍तान पर एकछत्र राज्‍य करने वालेे जिल्‍लेइलाही ने शहजादे सलीम को सबक सिखाने के लिए भारी लाव लश्‍कर भेजा । इस लश्‍कर के साथ अबुल फजल भी थे, जो कि उम्‍दा लेखक और अकबर के नवरत्‍नों में से एक थे । लेकिन शायद अकबर को भी यह मालूम न था कि ओरछा के रणबॉंकुरे शासक वीर सिंह पहले ही जहाँगीर को अपना दोस्‍त बना चुके थे । ओरछा का शासक बनने से पहले वीर सिंह झॉसी और ग्‍वा‍लियर के बीच पड़ने वाले बदोनी के जागीरदार थे । दोस्‍ती का फर्ज निभाने के लिए राजा वीर सिंह ने जहाँगीर के पास पहुँचने से पहले ही मुगल सेना से लोहा लिया । इस युद्ध में वीर सिंह ने न सिर्फ मुगल सेना को करारी शिकस्‍त दी, वरन् अबुल फजल का सिर काटकर इसेे अपनी दोस्‍ती के ताेहफे के तौर पर होने वाले मुगल शासक जहाँगीर को थाल में सजाकर भेंट कर दिया । यह सन् 1602 की घटना है । यह मान लें कि इस जीत ने ही ओरछा के शासक वीर सिंह और जहाँगीर की दोस्‍ती की बुनियाद को हमेशा के लिए पक्‍का कर दिया और इस बुनियाद पर ही जहाँगीर महल का वजूद खड़ा हुआ । जहाँगीर ने मुगलिया तख्‍त पर बैठते ही वीर सिंह जू देव को बुंदेलखण्‍ड का शासक और ओरछा को बुंदेलखंड की राजधानी घोषित कर दिया । इतना ही नहीं इस कला प्रेमी शहंशाह ने राजा वीर सिंह केे राजतिलक मेंं आने की स्‍वीकृति भी दे दी । जहाँगीर के मुगल  सम्राट बनने के पश्‍चात प्रथम ओरछा आगमन पर अपनी दोस्‍ती की स्‍मृति को चिरस्‍थाई बनाने के लिए ओरछा नरेश राजा वीर सिंह जू देव ने जहॉंगीर महल का निर्माण करवाया ।


आसमान की ओट में जहॉंगीर महल का सुुंदर दृश्‍य

जहॉंगीर महल के आंगन का दृश्‍य
17वीं शताब्‍दी में निर्मित यह यह तीन मंजिला इमारत इण्‍डो-मुगल शैली में स्‍थापत्‍य कला का अनुपम उदाहरण है । इसका मुख्‍य दरवाजा कलात्‍मक और परंपरागत तरीके से बनाया गया है । राजा के आगमन की जानकारी यहॉं स्‍थापित पत्‍थर के हाथियों के गले में पड़ी घंटियों द्वारा दी जाती थी । इस इमारत के विशालकाय गुंबद परसियन शैली में बने है । नीचे मखमली हरी घास के उद्यान इतने बड़े़े हैं कि इनमें हाथी भी आसानी से प्रवेश कर सकते थे । महल के बीचों बीच विशालकाय आँगन है जहॉं नृत्‍य, नाटक इत्‍यादि राग रंग के कार्यक्रम आयोजन किए जाते थे । इस इमारत की एक और विशेषता इसकी हैंगिंग बाल्‍कनियॉं हैं । जहाँगीर महल की विशालता का अनुमान लगाने के लिए यह जान लें कि इसमें 100 से ज्‍यादा कमरे और अनगिनत झरोखे हैं । इन झरोखेां में कुछ देर शांति से बैठकर शीतल वायु का आनंद लें और ओरछा का विहंगम दृश्‍य देखें । भारतीय पुरातत्‍व विभाग द्वारा यहॉं लेजर शो का भी आयोजन किया जाता है । इस विशालकाय महल केे उद्यान, दीवारों पर उकेरी गई रंगीन चित्रकारी, खुले झरोखे, दीर्घ गुबदें और छतरियॉं आपको दूसरी ही दुनिया में ले जायेंगी और आपको पुन: यहॉं आने के लिए मजबूर करेंगी ।  


जहॉंगीर महल की दीवारों पर बनी खूबसूरत पेंटिंग्‍स


ओरछा में पुराता‍त्विक महत्‍व के अन्‍य अनेक एतिहासिक और दर्शनीय स्‍थलों की जानकारी के लिए शीघ्र ही ओरछा पार्ट-3 प्रकाशित करने की तैयारी में हूँ ।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

ओरछा - पार्ट - 1

ओरछा: बुंदेलखंड के भाल पर जगमगाता हीरक तिलक । बुंदेलखंड के लोगों की जिजीवषा, बहादुरी के साथ कलाप्रेम की बानगी दिखाती जगह है ओरछा । बेतवा के तट पर स्थित प्राकृतिक सम्पदा और सुंंदरता से भरपूर स्‍थान । आप ओरछा पहुँचते ही सम्मोहन की अवस्था में आ जाते हैं । मुश्किल से  3-4 वर्ग किलोमीटर में फैली इस जगह का प्रत्‍येक दर्शनीय स्‍थान आपकी स्‍मृति में अंकित हो जाएगा । तो सबसे पहले यहाँ कैसे पहुंचा जाये, इसकी चर्चा कर लें । झांसी से ओरछा मात्र 16 किलोमीटर  की दुरी पर पड़ता है और झाँसी जो की उत्तर प्रदेश का प्रमुख शहर है, रेल तथा  सड़क मार्ग द्वारा पुरे भारत से बड़ी अच्छी तरह जुड़ा हुआ है । विशेषकर रेल मार्ग से तो भारत के किसी भी हिस्से से झाँसी बड़ी आसानी और तेजी से पहुंचा जा सकता है । झाँसी भी ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ महारानी लक्ष्मी बाई के किले सहित कई दर्शनीय स्थल है, जिनकी चर्चा फिर किसी पोस्ट में । झांसी में अगर थोडा  टाइम आपके पास है और उसका उपयोग करना चाहते हैंं तो फिर झॉंसी का किला देख आइये, आपको अच्छा लगेगा. झाँसी से ओरछा जाने के लिए ढेर साधन मौजूद हैं, बस, प्राइवेट टैक्सी, मिनी  पब्लिक ट्रांसपोर्ट से लेकर ऑटो रिक्शा तक । इस रूट पर ट्रेन उपलब्ध नहीं है । झाँसी से निकलकर ओरछा जाने वाली सड़क तक पहुँचते ही चारों ओर फैली हरियाली आपकी यात्रा की थकान को दूर करना शुरू कर देगी ।

ओरछा में ठहरने के लिए आपके बजट के अनुसार ढेर सारे छाेटे बड़े होटल, गेस्‍ट हाउस इत्‍यादि उपलब्‍ध हैं । मध्‍य प्रदेश सरकार द्वारा संचालित 'बेतवा रिट्रीट' के अलावा होटल शीश महल, होटल बुदेलखंड रिवरसाईड, ओरछा रिसोर्ट इत्‍यादि कुछ प्रमुख आरामदायक होटल्‍स हैं ।

ओरछा की सबसे प्रमुख जगह, जिसके कारण यहाँ का धार्मिक महत्व अयोध्या के समान है, वह है रामराजा मंदिर.  और ओरछा के लोग तो हल्‍की सी मुस्‍कराहट के साथ इतराते हुए आपको यही कहेंगे की जबसे श्रीराम राजा सरकार अयोध्या से  ओरछा पधारे हैं तबसे अयोध्या में  बचा ही क्या है । श्रीरामजी के अयोध्या से ओरछा आने की कहानी आप ओरछावासियो से ही सुने तो आपको ज्‍यादा आनंद आएगा । रामराजा सरकार का विशाल मंदिर पुराने बस स्टैंड के सामने से ही दिखता है । विस्‍तृत बाहरी प्रांगण में प्रवेश करतेे ही भक्‍तों का हुजूम आपके सामने होगा । मंदिर के अंदर प्रवेश करने सेे पहले ध्‍यान रखें कि कोई चमड़े की वस्‍तु जैसे बेल्‍ट इत्‍यादि बाहर ही उतार दें । मंदिर के अंदर मुख्‍य गर्भगृह में राम दरबार की झॉंकी विराजमान है तथा चारों ओर अन्‍य देवी देवताओंं की चौकियॉं स्थित हैं । श्रीराम राजा सरकार की एक झलक पाने के लिए व्‍याकुल भक्‍तजन मुख्‍य गर्भगृह के बाहर प्‍यासी नजरों के साथ करबद्ध खड़े आपको दिख जाएंगे । भक्‍तों के हृदय से सहज ही स्‍वर लहरी फूट पड़ती है : 'श्री रामचंद्र कृपालु भज मन, हरहु भव भय दारूणम्' । आपकी धर्म में रूचि हो या न हो लेकिन ऐसे प‍वित्र स्‍थान पर जाकर स्‍वत: ही अंतरतम में प्रशांति छाने लगती है । यहॉं पर किसी प्रकार की जल्‍दबाजी न करते हुए गहराई और सूक्ष्‍मता से निहारने पर आपको भक्ति, समर्पण, आध्‍यात्‍म और प्रेम के कई रंग दिखने लगते हैं । जैसा कि नाम से जाहिर है रामराजा सरकार मंदिर में श्रीरामजी की पूजा एक राजा केे तौर पर की जाती है तथा एक राजा की ही तरह उन्‍हें सुबह-शाम गारद द्वारा सशस्‍त्र सलामी दी जाती है । 




रामराजा सरकार मंदिर
मंदिर के बाहर निकलते ही बायीं ओर नजरें घुमाने पर आपको दो ऊँचे खंबे दिखाई देंगे । ये खंबे ओरछा के महाराजाओं द्वारा गर्मी के दिनों में सर्दी के अहसास के लिए बनवाए गए कूलिंग सिस्‍टम का एक अंग है । पर्सियन शैली में बनाया गया यह कूलिंग सिस्‍टम शायद भारत में केवल ओरछा में ही है, ऐसा जानकारों का मानना है । इन खंबों का नाम भारतीय कैलेण्‍डर में बारिश के मौसम केे महीनों के नाम पर 'सावन-भादों'  रखा गया है । ओरछा जाने पर इस सिस्‍टम को भी जरूर देखकर आयें ।  यहीं पर एक विशाल उद्यान है, जहॉं लालाा हरदौल की समाधि स्थित है । बुंदेलखंड में आज भी विवाह के समय पहला आमंत्रण लालाा हरदौल को दिया जाता है । लाला हरदौल की पीढि़यों से चली आ रही जनश्रुति, जिसमें रिश्‍तों के विश्‍वास के लिए बलिदान की महिमा है, फिर कभी आपके सामने लेकर आएंगे ।


सावन-भादों खंबे

अभी ओरछा में जानने-सुनने-देखने के लिए बहुत कुछ बाकि बचा है, जिसके लिए जल्‍दी ही ओरछा-2 प्रकाशित करने की कोशिश करूँगा ।