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| चतुभुज मंदिर, ओरछा |
चतुर्भुज मंदिर: अद्भुत शिल्प, विशालकाय भवन, सुंदरतम कारीगरी और उच्चकोटि की कलात्मकता के बावजूद अपने आराध्य के बगैर किसी मंदिर को आप देखना चाहें तो चतुर्भुज मंदिर में आपका स्वागत है । इस मंदिर का इतिहास ही ऐसा है कि इस मंदिर से सटा हुआ एक समय का रनिवास आज का प्रसिद्ध रामराजा का मंदिर है, जबकि चतुर्भुज मंदिर सैकड़ों वर्षों से बगैर देव प्रतिमा के अभिशप्त सा खड़ा हुआ है । दरअसल सन् 1558 से 1575 के मध्य राजा मधुकर शाह जी ने इस मंदिर का निर्माण अपनी रानी द्वारा अयोध्या से लाए जा रहे भगवान श्रीराम जी के लिए निर्मित करवाया था, लेकिन रानी गणेशकुँवरी ने श्रीराम की प्रतिमा को कुछ समय के लिए अपने रनिवास में स्थापित कर दिया । एक बार स्थापित होने के बाद फिर रानी के राजमहल को ही मंदिर का रूप प्रदान कर दिया गया और चतुर्भुज मंदिर सुंदर होनेे के बावजूद सूना पड़ा रहा । एक विशालकाय चट्टान के ऊपर बना यह मंदिर अपनी विशालता और कलात्मक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है । इसकी भीतरी छत की ऊँचाई इसे अपने समय के अन्य मंदिरों से अलग विशेषता प्रदान करती है ।
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| लक्ष्मीनारायण मंदिर का विहंगम दृश्य |
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| लक्ष्मी नारयण मंदिर, ओरछा |
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| छतरियॉं |
ओरछा बाबा की पोटली की तरह है, जो है तो छोटी सी लेकिन एक से एक पर्यटक रत्न भरे पड़े हैं । ओरछा गागर में सागर की तरह है आप गहरे उतरते जाइए, इतिहास की परत दर परत खुलती जाएगी । जगह छोटी सी लेकिन मन मोहिनी । छोटा करते करते भी तीन पार्ट बन गए और अभी लगता है कि बहुत कुछ छूट गया है । राय प्रवीण महल, राज महल, बेतवा नदी, ओरछा अभयारण्य आदि-आदि । हर स्थान अपने में पूरी एक कहानी समेटे हुए है । रामराज मंदिर में जरा बाहरी ऑंखें बंद कर अंदर के नयन खोलिए, महारानी गणेश कुँवरी श्री राम की भक्ति में भाव विह्वल, तन-मन की सुध खोए बैठी हैं । जहॉंगीर महल में महाराजा वीर सिंह जू देव के दरबार में फारस से आया वास्तुविद नयी इमारत बनाने का मशविरा दे रहा है । राय प्रवीण महल में राय प्रवीण कवि केशव के सान्निध्य में नई कविता की रचना कर रही है । और इन सबके बीच आप बेतवा नदी के किनारे मनोरम वातावरण में बैठे प्राकृतिक दृश्यों को निहार रहे हैं ।



